सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

यही मेरी महबूबा की पहचान है ...

जिसकी हंसी से हैं फूल झड़ते,
निकले शब्द जैसे वीणा की झंकार है,
जिसकी सांसों में चंदन की खुश्बू,
धड़कनों में तो जैसे बसा संसार है।
जिसकी भावनाएं हैं निश्छल कोमल,
और हदय तो, जैसे याकूब को बसाया रजिया सुल्तान है।

यही मेरी महबूबा की पहचान है ।


गुलाब की पंखुड़ी से हैं अधर जिसके,
और नयन तो कमल सदृश, जैसेे ईश्वर का दिया वरदान है।
उसके होंठों से लगे दो बूंद जल को पिया था मैने,
वह आज भी मेरे लिये जैसे अमृतपान है ।
प्यार का सरोवर कह दो उसे,
या जैसे किसी पुण्य के लिये किया गंगा स्नान है ।

यही मेरी महबूबा की पहचान है ।

सिंदूरी आभा है जिसके मन में,
सोने का पीलापन भी, फीका पड़़ता जिसके तन में।
भोर का स्वर्णिम गगन भी,
जिसकी अंगड़ाइयों में करता मद्यपान है ।
दुख दूसरों के देख,
अश्रु जिसके नयन से छलकते, वह ऐसी करूणा निधान है ।

यही मेरी महबूबा की पहचान है।


पलकें झुका ले तो लगे,
बिन सूरज ढले, यह कैसी शाम है ।
घनेरी केशुओं को गिरा ले सामने तो लगे,
जैसे आज फिर झुक गया आसमान है।
गुलाबी परिधान में कभी वह लगती पुष्प गुलाब का,
तो नारंगी कपड़ों में तो जैसे वह,प्याला भरी जाम है।
कामायनी कहूं उसे, या कहंू कुसुम,
उस रजनीगंधा का तो अब, समय भी हुआ गुलाम है।

यही मेरी महबूबा की पहचान है ।

खनक चूड़ी की, न पायल की झनक
हैचहक झूमके की, न गजरे की महक है ।
चांद भी शरमाये जिसके मुख को देख,
जन्नत की परी भी इर्ष्या से हैरान है ।
उस शंखिणीं को पाकर मैं इतना कृतकृत्य हूं,
जैसे ईश्वर का यह मुझ पर बड़ा ऐहसान है।

यही मेरी महबूबा की पहचान है ।

7 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

अच्छी अभिव्यक्ति

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत कविता।

सादर
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कभी यहाँ भी पधारें

Yashwant R. B. Mathur ने कहा…

आपकी पोस्ट की हलचल आज (29/10/2011को) यहाँ भी है

सदा ने कहा…

बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर पहचान है!

Mahesh Barmate "Maahi" ने कहा…

aapki mahbooba kee pahchaan pasand aayi...

aabhar