जिसकी हंसी से हैं फूल झड़ते,
निकले शब्द जैसे वीणा की झंकार है,
जिसकी सांसों में चंदन की खुश्बू,
धड़कनों में तो जैसे बसा संसार है।
जिसकी भावनाएं हैं निश्छल कोमल,
और हदय तो, जैसे याकूब को बसाया रजिया सुल्तान है।
यही मेरी महबूबा की पहचान है ।
गुलाब की पंखुड़ी से हैं अधर जिसके,
और नयन तो कमल सदृश, जैसेे ईश्वर का दिया वरदान है।
उसके होंठों से लगे दो बूंद जल को पिया था मैने,
वह आज भी मेरे लिये जैसे अमृतपान है ।
प्यार का सरोवर कह दो उसे,
या जैसे किसी पुण्य के लिये किया गंगा स्नान है ।
यही मेरी महबूबा की पहचान है ।
सिंदूरी आभा है जिसके मन में,
सोने का पीलापन भी, फीका पड़़ता जिसके तन में।
भोर का स्वर्णिम गगन भी,
जिसकी अंगड़ाइयों में करता मद्यपान है ।
दुख दूसरों के देख,
अश्रु जिसके नयन से छलकते, वह ऐसी करूणा निधान है ।
यही मेरी महबूबा की पहचान है।
पलकें झुका ले तो लगे,
बिन सूरज ढले, यह कैसी शाम है ।
घनेरी केशुओं को गिरा ले सामने तो लगे,
जैसे आज फिर झुक गया आसमान है।
गुलाबी परिधान में कभी वह लगती पुष्प गुलाब का,
तो नारंगी कपड़ों में तो जैसे वह,प्याला भरी जाम है।
कामायनी कहूं उसे, या कहंू कुसुम,
उस रजनीगंधा का तो अब, समय भी हुआ गुलाम है।
यही मेरी महबूबा की पहचान है ।
खनक चूड़ी की, न पायल की झनक
हैचहक झूमके की, न गजरे की महक है ।
चांद भी शरमाये जिसके मुख को देख,
जन्नत की परी भी इर्ष्या से हैरान है ।
उस शंखिणीं को पाकर मैं इतना कृतकृत्य हूं,
जैसे ईश्वर का यह मुझ पर बड़ा ऐहसान है।
यही मेरी महबूबा की पहचान है ।
मेरा सपना
सोमवार, 24 अक्टूबर 2011
सोमवार, 4 जुलाई 2011
कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता...
कुछ तो वजहें होंगी, कुछ तो अफसाने होंगे ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।
निश्चय ही धरती के भीतर,कुछ तो उथल-पुथल होती होंगी ।
भावनाओं के कोमल सतह पर,कठोर चट्टानों का आधात होता होगा।
कभी भूचाल आते होंगे,
कभी अंदर का लावा पिघलकर,
कलम के सहारे शब्दों का शक्ल लेता होगा ।
सारी वेदनायें अक्षरों में सिमट जाती होंगी,
और बनती होंगी, झकझोर देने वाली कविता ।
कोई तो है, जिसके कटु वचनों से आहत होता होगा हर रोज तुम्हारा मान,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता, इस तरह मातमी गान ।
पर्वतों सा मुकुट पर तेरे,
किसी सिरफिरे का शत बार प्रहार होता होगा ।
तुम्हारे केशुओं सा फैली घनी चोंटियों की श्रृंखला में,
किसी मदभरे गज का भीतर तक संघात होता होगा।
टूटती होंगी शिखर छूती टहनियां,
उजड़ती होंगी भीतर कलरव करती खग सी ख्वाईशो के घोसले।
पनाहों के लिये भटकती होंगी,तुम्हारे भीतर का अंर्तद्वंद ।
और तब टूटती होगी मर्यादा कलम की,
टूटता होगा शब्दों का वह सम्मान ।
पता नहीं क्यों?जब-जब पढ़ा करता तुम्हे, तब-तब होता ऐसा ही कुछ भान ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान।
कोई तुझे अपनी तप्त रश्मियों से दग्ध कर,
कुरेदता होगा रसातल तक ।
तुम्हारे हिमशिखर सा पाषाण इरादे पिघलते होंगे ।
और चक्षु संबंधों का विस्तार पाती होंगी अधर तक ।
बहती होगी सरिता,समस्त वेदनाओं के करकटों को स्वयं में समेटकर ।
सागर सा धैर्य, मुख का तुम्हारा,विचलित होता होगा क्षण भर को ।
हृदय में उठती होंगी विशालकाय लहरें ।
डूबती होंगी तटें ना जाने कितनी,
कितनी अभिलाषाएं मृतप्राय सी होती होंगी सतह पर ।
और तब कहीं कागजों पर रेखांकित होती होगी,
एक नारी का चोटिल स्वाभिमान ।
ना जाने क्यों ? तुम्हारे शब्दों में छिपी इन्ही वेदनाओं को देख ,
हर रोज टूटा करता, मेरे पुरूष होने का अभिमान ।
सच कहता हूं, कुछ तो जरूर है,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।
निश्चय ही धरती के भीतर,कुछ तो उथल-पुथल होती होंगी ।
भावनाओं के कोमल सतह पर,कठोर चट्टानों का आधात होता होगा।
कभी भूचाल आते होंगे,
कभी अंदर का लावा पिघलकर,
कलम के सहारे शब्दों का शक्ल लेता होगा ।
सारी वेदनायें अक्षरों में सिमट जाती होंगी,
और बनती होंगी, झकझोर देने वाली कविता ।
कोई तो है, जिसके कटु वचनों से आहत होता होगा हर रोज तुम्हारा मान,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता, इस तरह मातमी गान ।
पर्वतों सा मुकुट पर तेरे,
किसी सिरफिरे का शत बार प्रहार होता होगा ।
तुम्हारे केशुओं सा फैली घनी चोंटियों की श्रृंखला में,
किसी मदभरे गज का भीतर तक संघात होता होगा।
टूटती होंगी शिखर छूती टहनियां,
उजड़ती होंगी भीतर कलरव करती खग सी ख्वाईशो के घोसले।
पनाहों के लिये भटकती होंगी,तुम्हारे भीतर का अंर्तद्वंद ।
और तब टूटती होगी मर्यादा कलम की,
टूटता होगा शब्दों का वह सम्मान ।
पता नहीं क्यों?जब-जब पढ़ा करता तुम्हे, तब-तब होता ऐसा ही कुछ भान ।
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान।
कोई तुझे अपनी तप्त रश्मियों से दग्ध कर,
कुरेदता होगा रसातल तक ।
तुम्हारे हिमशिखर सा पाषाण इरादे पिघलते होंगे ।
और चक्षु संबंधों का विस्तार पाती होंगी अधर तक ।
बहती होगी सरिता,समस्त वेदनाओं के करकटों को स्वयं में समेटकर ।
सागर सा धैर्य, मुख का तुम्हारा,विचलित होता होगा क्षण भर को ।
हृदय में उठती होंगी विशालकाय लहरें ।
डूबती होंगी तटें ना जाने कितनी,
कितनी अभिलाषाएं मृतप्राय सी होती होंगी सतह पर ।
और तब कहीं कागजों पर रेखांकित होती होगी,
एक नारी का चोटिल स्वाभिमान ।
ना जाने क्यों ? तुम्हारे शब्दों में छिपी इन्ही वेदनाओं को देख ,
हर रोज टूटा करता, मेरे पुरूष होने का अभिमान ।
सच कहता हूं, कुछ तो जरूर है,
वरना कोई रोज-रोज नहीं लिखा करता इस तरह मातमी गान ।
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